अहसास मर न जाए, तो इंसान के लिए,
काफी है, इक राह की ठोकर लगी हुई ।
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वक़्त के पास न आँखें हैं, न अहसास न दिल,
अपने चेहरे पे कोई दर्द न तहरीर करो।
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मेरे घर की मुफ़लिसी को देख कर,
बदनसीबी, सर पटकती रह गयी।
एक दिन की मुख़्तसर बारिश के बाद,
छत कई दिन तक टपकती रह गयी,
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हम उसकी शरारत से, परेशां तो बहुत हैं,
हँसते हुए बच्चे को रुला भी नहीं सकते।
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ग़म इसलिए भी ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिए,
बग़ैर धूप के पौधा, हरा नहीं होता।
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गहराइयों में रूह की सूरज उगा कर देखो,
तिश्नालब को धूप में, पानी पिलाकर देखो।
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चेहरा खुली किताब है, उनबान कुछ भी दो,
जिस रुख़ से भी पढ़ोगे, मुझे जान जाओगे।
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