रविवार, 17 फ़रवरी 2013

अहसास



अहसास मर न जाए, तो इंसान के लिए,

काफी है, इक  राह की ठोकर लगी हुई ।

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वक़्त के पास न आँखें हैं, न अहसास न दिल,
अपने   चेहरे   पे   कोई  दर्द   न  तहरीर   करो।

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मेरे घर की मुफ़लिसी को देख कर,
 बदनसीबी, सर पटकती रह गयी।

एक  दिन की मुख़्तसर बारिश के बाद,
छत कई दिन तक टपकती रह गयी,
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हम उसकी शरारत से, परेशां तो बहुत हैं,
हँसते हुए बच्चे को रुला भी नहीं सकते।
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ग़म इसलिए भी ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिए,
बग़ैर   धूप   के   पौधा,  हरा   नहीं   होता।
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गहराइयों में रूह की सूरज उगा कर देखो,
तिश्नालब को धूप में, पानी पिलाकर देखो। 
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चेहरा खुली किताब है, उनबान कुछ भी दो,
 जिस रुख़ से भी पढ़ोगे, मुझे जान जाओगे।
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